Pपुलवामा हमले पर बुद्धिजीवियों की चुप्पी

CRPF पर पुलवामा हमले के  बाद कि असल कार्यवाही में social मीडिया का कितना असर रहेगा यह अंदाजा लगाना अभी मुश्किल है, पर बीते दिनों ने हमारे देश क लुतियेन समाज के असल चेहरा सामने ला दिया है। उत्तराखंड के इंतेल्लेक्तुअल समुदाय ने जो रंग पुलवामा हमले क वक़्त  दिखाये हैं वो बहुत ही शर्मनाक है । प्रेस से लेकर जाने माने एनजीओ के बुधिजिवो कि कोई प्रतिक्रिया के लिये ये राज्य तरस गाया पर वो “चूँ” तक ना कर पाये ।शायद उन्हें लगता हो facebook और twitter कि दीवारों पे चिल्लाने और बहस करके कोई फायदा नहीं । हो सकता है की उनकी सोच वाजिब हो, 14 फरवरी के दिन से लगातार एक तब्का या तो जवानों कि शहीदी पे चुप बैठा है य फिर पाकिस्तान और social मीडिया में हिंदुस्तान को गाली देते कश्मीरी को बचाते आ रहे हैं। जो कुछ बोल पाये हैं, वो राजनीति कर रहे हैं, इसका हाल के उद्धारण  अपने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत हैं, जब उत्तराखंड अपने शहीद सीआरपीएफ एएसआई मोहनलाल रतूड़ी की शहादत को नमन कर रही तब अपने फेसबूक हैंडल से उन्होंने राजनीति का घिनौना रूप दिखाया जिसमें भाजपा सरकार को नाकाम सिद्ध करने का काम किया जा रहा था, लोगों के काफी सुनने  के बाद उन्होंने अपना ये पोस्ट हटा दिया  ।

शहेला राशिद और कन्हैय्या कुमार जैसे लोग हमारे देश को खोखला कर रहे है वही इंके जैसे विचारधारा वाले भी उत्तराखंड में कम नहीं हैं । और बात यह भी नहीं है के ये लोग भाजपा के है या कांग्रेस के या कम्युनिस्ट समुदाय से नाता रखने वाले |  १५ तारिख को ही त्रिवेंद्र रावत सरकार के एक विधायक नेता ने  ऐसी ही अभद्र टिपण्णी की थी जो अचानक ही सोशल मीडिया पर आग की तरह फ़ैल गयी ,आज वो पोस्ट वेब में नहीं मिलती, किस्ने कैसे हटवाई कोई नहीं जनता |

राज्य एक ऐसे दौर से जा रहा है जहा अभिव्यक्ति की आजादी को तोड़  मरोड़ के पेश किआ जा रहा है | बिना शोध करके गाली गलोच करना भी एक फैशन बन गया है | चलिए अब वह गालियां भी नहीं चुबती है जनता को, सब आदि हो चुके हैं गाली गलोच सुनकर अब सन्नाटा  और चुप्पी चुभती है | जब आप अपने एनजीओ के  मार्किट को बढ़ने  लिए  लोगो से अपील सोशल मीडिया में करते हैं, आपके हर दूसरे दिन पॉलिटिकल व्यूज होते हैं पर पुलवामा हमला  आपके इन्द्रियों को बंद करदे , तो यह हरकत ना सिर्फ उन हस्तियों को दोगले बल्कि एक अवसरवादी क रूप में प्रदर्शित करती है |

किसी आदमी से अगर सैकड़ो लोग  प्रभावित होकर अपने जीवन का चलन बदलते हैं तो उनसे यह भी उम्मीद राखी जाती है के वह देश के लिए भी भावना प्रकट  करेगा | ऐसे लोगों  से हमारा हर वक़्त सामना हो जाता है, कभी किसी लिटरेचर फेस्टिवल में जूरी में बैठे हुए या फिर किसी प्रोग्राम में चीफ गेस्ट बने हुए |कई ऐसे भी मिलेंगे जो नामक पत्रकार है पर पेज  ३ की दुनिआ का आनंद  ले रहे हैं | दम्भ आदमी को पगलाए देता है,इसका जीता जगता प्रमाण होते हैं ऐसे लोग | दम्भ किस बात का ये भी समझना जरूरी है, किसी डिग्री का  शायद, या किसी सरकारी पोजीशन में होने का, पर क्या करे ” हर आदमी अपनी नज़रों में सिकंदर नज़र आता है यहाँ | देहरादून में भी एक लुटियंस दिल्ली दीखता है जो कोलोनियल विरासतों को पूजता है और एक कौम बना के  रहना चाहता है| ये सब लोग आज बेनक़ाब होते दिखते हैं |  सबका चोला समझ में आता हैं | 

एडिटर की कलम से |  


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