shankaracharya

भारतीय समाज में वेदान्त को फिर से प्रतिष्ठापित करने के लिये आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में देश के चार कोनों में अपने चार मुख्य शिष्यों के नेतृत्व में चार पीठों की स्थापना की थी। आदि शंकर ने पहली पीठ देश के दक्षिणी कोने में कर्नाटक के श्रंगेरी में युधिष्ठर संवत 2648 में स्थापित की। इसका नामकरण  शारदा पीठ किया गया। वर्तमान में, महाभाग श्री भारती तीर्थ इस पीठ के शंकराचार्य हैं। पश्चिमी कोने में गुजरात के व्दारिका में व्दारिका शारदा पीठ की स्थापना की। वर्तमान में इस पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी हैं। पूर्वी कोने में उड़ीसा के पुरी में  युधिष्ठर संवत 2655 में गोवर्धन पीठ बनाई गई। वर्तमान में इसके प्रमुख महाभाग स्वामी निश्चलानंद जी हैं। उत्तर में बद्रीनाथ के निकट युधिष्ठर संवत 2641 से 2645 के मध्य ज्योतिष्पीठ निर्मित की गई। आजकल इस पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद जी हैं।

दरअसल, इन पीठों के प्रमुखों को शंकराचार्य कहा जाता है। ये शंकराचार्य परम्परा से उनके उत्तराधिकारी माने जाते हैं। काशी और कांची में दो उप पीठों की भी स्थापना की गई। एक तमिलनाडु के कांची में कांचीकामकोटि पीठ है जहां आदि शंकराचार्य “लिंग पूजा”  करते थे। दूसरी उप पीठ उत्तर प्रदेश के काशी में है जो सुमेरु पीठ के नाम से जानी जाती है। इसके वर्तमान प्रमुख स्वामी नरेन्द्रानंदजी हैं। लेकिन कुछ हिंदू संगठन इसे मान्यता प्रदान नहीं करते। हर पीठ के वर्तमान शंकराचार्य अपने उत्तराधिकारी को नियुक्त करते हैं और शेष तीनों शंकराचार्य उन्हें मान्यता प्रदान करते हैं। शंकराचार्य वही हो सकता है जो जन्म से ब्राह्मण हो और वेदांत व योग में पूरी तरह निष्णात हो।

शंकराचार्य एक महान समन्वयवादी थे। उन्हें सनातन धर्म को पुनः स्थापित एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है। एक तरफ उन्होने अद्वैत चिन्तन को पुनर्जीवित करके सनातन हिन्दू धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ किया,  तो दूसरी तरफ उन्होने जनसामान्य में प्रचलित मूर्तिपूजा का औचित्य सिद्ध करने का भी प्रयास किया। उन्होंने नंगे पैर पूरे भारत की यात्रा की और हर कस्बे में विद्वानों से तार्किक विचार-विमर्श किया। उन्होंने सबसे पहले भारत को एक सत्ता या अस्तित्व के रूप में सोचा और उससे जुड़े अपने विचारों को देशभर में फैलाया।

अव्दैत वेदान्त दर्शन मूलत: मानता है कि आत्मा (चेतना) हमें संचालित करने वाली सबसे बड़ी शक्ति ब्रह्म से भिन्न नहीं है। ज्ञान हासिल कर हम भौतिकवादी नश्वर संसार से मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। यानी बार-बार जीवन – मरण के चक्र से मुक्त हो सकते हैं। आदि शंकराचार्य ने कहा कि ज्ञान के दो प्रकार होते हैं। एक पराविद्या कहा जाता है और दूसरा अपराविद्या कहा जाता है। पहला सगुण ब्रह्म (ईश्वर) होता है लेकिन दूसरा निर्गुण ब्रह्म होता है। सार रूप में ब्रह्म और जीव मूलतः और तत्वतः एक हैं। हमे जो भी अंतर नजर आता है उसका कारण अज्ञान है। जीव की मुक्ति के लिये ज्ञान आवश्यक है। जीव की मुक्ति ब्रह्म में लीन हो जाने में है।

आज के संशयग्रस्त विश्व को यह दर्शन जीवन जीने की सही राह दिखाता है। लेकिन दुनिया में आज असहिष्णु धर्मों का बोलबाला है जो एक किताब के आधार पर मजहब या धर्म को सीमित कर देते हैं। उसमें गवेषणा या निरंतर परिष्कार का कोई स्थान नहीं है। अनेक संघर्षों और रक्तरंजित घटनाक्रमों का यह बहुत बड़ा कारण बनता है। वसुधैव कुटुम्बकम की भारतीय अवधारणा के साकाररूप लेने में यह सबसे बड़ी बाधा है। अतएव, आदिशंकराचार्य व्दारा संस्थापित पीठों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। उन पर इस ज्ञान को फैलाने का गंभीर दायित्व है जो उन्हें आदिशंकराचार्य ने सौंपा है।  

यह ठीक है कि आदि शंकराचार्य की 108 फुट की मूर्ति मध्यप्रदेश के खंडवा जनपद के ओंकारेश्वर में स्थापित की जा रही है। लेकिन सिर्फ मूर्ति लगाने से वांछित ज्ञान से जनमानस आलोकित नहीं होगा। हां, अनुकूल वातावरण बनाने में यह अवश्य सहायक हो सकता है। केन्द्र सरकार ने श्रंगेरी मठ के इस प्रस्ताव को तो स्वीकार कर लिया कि आदि शंकराचार्य के जन्मदिवस को देशभर में ‘दार्शनिक दिवस’ के रूप में मनाया जाये। लेकिन इस पर अमल अभी तक नहीं हो सका है। यह मठ उपनिषदों पर शंकराचार्य की टीका और भारतीय दर्शन में उनके योगदान के बारे में जागरूकता फैलाने के पक्ष में है। दरअसल, सरकार अभी तक यही तय नहीं कर पाई है कि  कैसे देशभर में इस दिन को मनाया जा सकता है।

 मंत्रालय मठ को केवल यह सुझाव देता है कि वे राज्य सरकारों से संपर्क कर सकते हैं। श्रंगेरी मठ 1996 से हर साल इस संबंध में केंद्र को पत्र लिख रहा है। मठ ने वाजपेयी सरकार से भी बातचीत की कोशिश की थी, लेकिन कभी बातचीत ही नहीं हो पाई। केरल और कर्नाटक सरकार ने लगातार रिमाइंडर भेजे जाने के बाद 2005 में मठ का प्रस्ताव स्वीकार किया था, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने तो कभी उनके पत्र का जवाब ही नहीं दिया

केंद्र और राज्य सरकारों को आदि शंकराचार्य की ज्ञान परम्परा को और उनके दर्शन को हिन्दू जनमानस के आचरण में उतारने के लिये हर संभव कोशिश करनी चाहिये। यह इसलिये जरूरी है या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि यह समय की मांग है, क्योंकि पूरा विश्व आज वरेण्य जीवन शैली को लेकर पूरी तरह संशयग्रस्त है। वह औद्योगिकीकरण से उत्पन्न जटिलताओं के निराकरण में असहाय है। इस जटिल परिस्थिति का समाधान आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी ही कर सकते हैं।

अनिल गुप्ता
(वरिष्ठ पत्रकार)


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