हिमालय में सदी के बड़े भूकंप के संकेत

अक्टूबर से दिसंबर 2019 के बीच हिमालयन और यूरेशियन टेकटोनिक  में एक के बाद एक भूकंप के झटके महसूस किये जा रहें हैं। दुनियाभर के संजीव सेसिमिक मॉनीटर्स के मुताबिक,  यूरेशियन प्लेट्स पहले से ज्यादा तेज़ी और ज्यादा परिमाण से टकरा रही है। पिछले पांच दशकों में भयंकर भूकंप न आने के कारण, यह  बताया जा रहा है के ‘ द बिग वन’ की उत्पत्ति होने के समीप है। देहरादून के वाडिया भौगोलिक संसथान द्वारा पहले ही कुछ चेतावनियां जारी की  है, जो पहले तो एक शोधपत्र द्वारा प्रेरित लगती है। पर सेसिमिक डाटा मॉनिटर द्वारा पिछले तीन महीनो से औसत ४ रिक्टर से उप्पर चल रहे हिमालयन – यूरेशियन टेकटोनिक प्लेट के डाटा को देख कर  लगता है के स्तिथि भयावह भूकंप की ओर है। नवंबर से दिसंबर के बीच बढ़ते भूकंप की आवृत्ति वाडिया की बताई हुई बात की तरफइशारा कर रही है | 

गौरतलब है के हर  १०० से १५० साल में एक भयावह भूकम्प की उत्पत्ति होती है | पिछले ५०० साल का डाटा, जो रेडिओकार्बोन तकनीक से एकत्रित किआ गया है, दिखाता है के, पिछले १०० सालो में यूरेशियन और हिमालयन प्लेटों में ८ रिचटर का भूकंप नहीं आया है. चुकी शोधपत्रों के अनुसार हिमालयन और यूरेशियन प्लेट   एक के उप्पर उलझी है,जिससे इनकी गाँठ मे ऊर्जा संगृहीत होते रहती है | डाटा दिखाता है,की हिमालयन प्लेट्स हर साल १० सेंटीमीटर यूरेशियन प्लेटों तरफ जा रहीं हैं | जिस कारण इनके अवरोधक क्षमता बढ़ गयी है, ऊर्जा इन अवरोधों में बढ़ने के कारण बड़े से बड़े भूकंप को बुलावा दे रही है | 

नवंबर- दिसंबर में मुनस्यारी  और चमोली में आये लगातार भूकम्प एक इशारा है की इस  बेल्ट में कहीं बड़ा फाल्ट खुलने जा रहा है | चूँकि सारे भूकंप ३.५ रिक्टर  आये हैं, जो सेसिमिक डाटा के मुताबिक एम८ केटेगरी का भूकंप आने की की तरफ इशारा करता है।  

मुश्किल की बात  यह है है की ऐसी परिस्तिथि  निपटने के लिए हिमालयन बेल्ट में सजीव सेसिमिक मॉनीटर्स  काबिल नहीं हैं जो अत्याधुनिक कृतिम बुद्धिमतत्व तकनीक से लैस हों।  उत्तराखंड में ज्यादातर मकान एवं ढांचे भूकम्परोधी होने की रिपोर्ट नकारात्मक रुख दिखाती  है। आज जरूरत है की सरकारी संस्थाए भूकंप मूल्यांकन कराएं जिससे राज्य में बने अपार्टमेंट और मकानों के ढांचों को परखा जा सके। 

उत्तराखडं राज्य में जोन ५ और जोन ४ पड़ने से भूकंप का खतरा बढ़ जाता है क्युकी इन्ही जोन में ८ रिक्टर स्केल से उप्पर के भूकंप पाए जाते हैं।  देहरादून शहर में शहरीकरण के दस्तक देते ही, अवैध तरीके से ढांचे बनाने का कारोबार भी बढ़ गया, जिसमे मकानों के नक़्शे बिना भूकंप के मूल्यांकन किये बिना ही पास किये  गए। उत्तराखंड राज्य के दूसरे शहरो जैसे हरिद्वार, हल्द्वानी और नैनीताल की भी स्तिथि ऐसी ही है। एक शोधपत्र के अनुसार नैनीताल के भूकंप मूल्याङ्कन से पता चला है के ८५ % माकन और  ढांचे ७ रिक्टर से ज्यादा भूकंप की तीव्रता झेलने योग्य नहीं हैं।  

सरकारी तंत्र के इस लचीलेपन का मूल्य आम आदमी अपनी जान और माल के नुकसान से भुगतेगा।  भूगोल विशेषज्ञों के अनुसार , असल बाधाएं हिमालयी राज्यों में तब आएंगी जब भूकम्प से प्रेरित होकर हिमालय दरकने की घटना होंगी, जिससे न सिर्फ हिमस्खलन होगा परन्तु निचले हिमालय की पहाड़िया भी भूस्खलन का शिकार होंगी।   बचाव और राहत कार्यों में बढ़ा किस प्रकार कड़ी होंगी वो इस बात से सोची जा सकती है के हिमालय राज्यों की पहाड़िया पानी को सोकने से ही स्खलित होने लगती हैं।  

दुनियां में सबसे खतरनाक जोन जहाँ  भूकंप के झटके सदियों से मानव सभ्यता के लिए एक चुनौती बने है, उस क्षेत्र  में उत्तराखड एक प्रधान राज्य है जो न सिर्फ भारत के लिए बल्कि पूरे दक्षिण पूर्वी देशो के लिए एक सूचक की तरह काम करता है।  इस बात की गहराई इससे जान पड़ती है जब सुनामी प्रभावित देश, इंडोनेशिया और थाईलैंड हिमालयी और यूरेशियन टेकटोनिक बेल्ट में पड़ते हों. 

नेपाल २०१५ में ७. तीव्रता  आज तक का सदी में सबसे भयंकर भूकंप मना  जाता है। पर भूगोलविदों का कहना है के, नेपाल का भूकंप  सिर्फ एक रुख है उस हिमालयन महाभूकम्प का जिसका एम ८ अल्गोरिथम ने भविष्यवाणी की है।  हिमालयन रेंज में ऐसे हज़ारों की संख्या में फाल्ट हैं जो किसी भी वक़्त खुल सकते हैं, एल्सेवियर जर्नल के अनुसार यह फाल्ट कभी भी किसी भी वक़्त खुल सकते हैं।  यूरेशियन प्लेटों में जो ऊर्जा भर गयी है जिससे यह फाल्ट में खिचाव उत्पन्न हो रहा है, ज्यादातर समय इनसे उत्पन्न्न भूकंप १. से २ रिक्टर स्केल का हुआ करता था , पिछले तीन महीनो में इन में १.५ रिचटर की वृद्धि देखी  गयी है।

यह वृद्धि आगे भी ऐसे ही जारी रहने के ज्यादातर सेसिमिक मॉनीटर्स संकेत हैं। सतर्कता ही इस भूकंप से बचाव करने में सहयोग दे सकती है। हिमालयी वर्ती राज्यों के नागरिक अपने मकान का भूकंपरोधक मूल्याङ्कन करवा सकते है, जिससे नवीनीकरण की संभावनाएं जानी  जा सकती हैं। सरकारें SDRF और NDRF की मॉक ड्रिल से टीमों को तैय्यारी रख सकती हैं जिसमे भूस्खलन और हिमस्खलन के बावजूद भी कैसे रहत कार्य किया जाये इस पे चर्चा एवं किसी परिणाम पर पंहुचा जा सके।

चुकी यह फाल्ट हर सदी में एक भयावह भूकंप का रूप लेता हैं, जिसमे ज्यादातर फाल्ट सहारनपुर, दिल्ली, देहरादून और चमोली, मुंश्यारी और नेपाल में स्तिथ है,इन शहरों की प्लानिंग पे खासा ध्यान देने की जरुरत है।  अंत के नब्बे के दशक में आये चमोली और उत्तरकाशी के भूकंप की यादें आज भी कई उत्तराखंडवासियों को जख्झोर कर रख देती हैं | उस दौर के भूकंप सर ६.५ रिक्टर से ७. ५ रिक्टर स्केल के थे, तो सोचिये जिस भूकम्प की कल्पना वाडिया के भुविज्ञानिको ने की है वो क्या भयावह मंज़र आज की स्तिथि में पैदा करने की क्षमता रखता है | 

नितिन चंदोला


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