जागर-एक-अद्भुत-रचना

जागर का शाब्दिक अर्थ है जागृत करना। जागर का अभिप्राय है अपने इष्ट देव, पित्र देवों का आह्वान करना, वाद्ययंत्रो की ध्वनि के साथ  ध्वनि मंत्रो का उच्चारण करना। मान्यतानुसार देवी देवता सुमिरन करने पर किसी पर प्रकट होते हैं।वह अपनी इच्छा, वेदना, उपाय अपने ग्रामवासियों को सुनाते हैं तथा आशीष देते हैं।

उत्तराखंड की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का निर्माण ही बाहरी जनजातियों से हुआ है। अतः इस जागरी परंपरा का कोई लिखित प्रमाण नही है किंतु जागर का जो गायन है, ये विभिन क्षेत्रों में अलग प्रकिया से होता है व शास्त्रीय। चूंकि जागर का जो गायन है वह शास्त्री गायन से मिलता जुलता है एवं देवभूमि में अधिकांश ब्राह्मण मद्रास व मध्य भारत से आये हैं तो यह आशंका लगाई जाती है कि यह शैली इन्ही से विकसित हुई है। राजस्थानी वंशज से नाता रखने वाले राजपूतों के महलों में पुराने गानो को गीत के माध्यम से सुनाया जाता है तो क्षत्रिय समाज के जागरों में संगीत का अत्यंत महत्व रहता है।

गढ़वाल व कुमाऊं मुख्यता शिव की भूमि रही हैं। यहां वैष्णव व शात मत के आने से भी पहले से शैव मत के लोग मौजूद थे। अतः भैरव का व देवी का नाम प्रचलित है किंतु राम का उल्लेख हमे देखने को  नही मिलता और शिव के बाद जिसका उल्लेख सबसे ज़्यादा मिलता है वो है नागराजा सेमुख में। तो नागराजा सेमुखे में भी जागर जो लगा है वह वहां की कथानुसार है। वहां पर गंगू गंगोला राजा था।वहीं पर श्री कृष्ण ने लोहाघाट में बाणासुर का वध किया जागर का कुछ हिस्सा अघोरी विद्या से आता है क्योंकि दिन-रात्रि अग्नि जलाकर , ढोल-दमाऊ(पहाड़ के वादन यंत्र) पर औजी(एक पहाड़ी सामुदाय जो जागर की विद्या जानते हैं)जागर लगाते थे। कहा जाता है कि इस विद्या का गड रहा है भैरव गड़ी ,लैंसडाउन जहां इसकी प्रस्तावना हुई ।

यहाँ पर जागर को समझने वाली बात यह है कि देवता अवतरण अलग है व आत्मा अवतरण अलग है। आत्मा अवतरण की प्रक्रिया को ‘हन्त्या’ कहा जाता है। तो इस उजागर आत्मा की भी  पूजा की जाती है क्योंकि कोई सिद्ध पुरुष ऐसा नही है जो इसे दबा सके। 

गोपेश्वर में एक स्थान है , एक पत्थर है जिसे दबा रखा है जिसे भैरव कहा गया है।भैरव भी कही प्रकार के है।

शिव से उत्पन्न भैरव अलग हैं। भैरव कोतवाल अलग हैं, नाथ बुद्ध भैरव अलग हैं। उदहारण स्वरूप- काल भैरव है जो बकरे की बलि मांगते हैं, बटुक भैरव हैं जो रोट मांगते हैं इत्यादि।

अब देवता भी २ प्रकार के होते हैं। एक होगये करुण  व दूसरे निष्ठुर। करुण देवता पूजा के अभाव में नही रहते किन्तु निष्ठुर स्वभावी देवता अगर पूजित नही किये जायें तो वह क्रोधित होजाते हैं और उनका आक्रोश समस्त पुश्त पर हावी होजाता है। अतः जागर विद्या है उनका गायन, उनकी प्रेम की वस्तुओं, व घटनाओं को उजागर करना ताकि वह सम्मुख उपस्थित हो व समस्या का निवारण करें। किन्तु वर्तमान समय मे भक्ति की नही डर की पूजा हो रही। लोग भक्ति नही अपितु स्वयं पर कोई आंच न आये इस हित से पूजा कर रहे हैं जो कि निंदात्मक है। इस जागरी विद्या का प्रमुख संबंद्ध मद्रास में भी देखने को मिलता है। मद्रास में आज भी देवी अवतरण होता है।

अतः अब आते है  मुख्य जागर की विशेषताओं पर।

जागर में मुख्यतः पूरी कहानी चलती है। इस कहानी में मुख्यतः तीन-चार धुने होती हैं व ताले होती हैं। पुन अवगत करा दूं कि मंडान की शैली अलग होती है और भीतर गायन शैली अलग।आज जागरी विद्या के पतन का प्रमुख कारण है- पलायन। पलायन की मार ऐसी पड़ी है कि वर्तमान पीढ़ी जो बाहर बस चुकी है, वह यह विद्या तो छोड़िए , अपनी पहाड़ी भाषा को दूर दूर तक नई जानते। ये देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जागर जो है वो एक भावना है। आप एक स्वर्गीय शक्ति या कहिये एक आत्मा है उसे पुनः जाग्रत कर रहे हैं तो उसकी भावना को पकड़ना अत्यंत आवश्यक है कि देवी अथवा देवता को क्या प्रिय था, किस समय पर जागरी को पकड़ना है कि वह देवता रोयेगा व नाचेगा।

अब प्रश्न उठता है जागर है क्या कहाँ से आया?

जागर दो प्रकार से गाये जाते हैं। एक होता है डॉर थाली पर और दूसरा होता है मंडान में।मंडान में जो जागर होता है उसे औजी लगते हैं किन्तु डॉर थाली का जागरी किसी भी जात का हो सकता है- ब्राह्मण है क्षत्रिय। 

अब जागर में आती है एक और विद्या जिसे बुगशाड़ी विद्या(एक सिद्ध तांत्रिक विद्या)। जौनसार एक ऐसा गड है जहां आज भी आलौकिक तंत्र विद्याएँ प्रचलित है। जागरों में भी एक मत नही है। होता यह है कि भाषा और भौगोलिक परिस्थितियों  के आधार पर जागर भी बदलते हैं। जैसे- राउंसल्यू कु बोडू , बुरासयुं कु फूल। जिस जगह जो वस्तु उपस्थित थी , उसी के अनुसार यहां पर वर्णन होता है।

एक कथा है पौड़ी जिले के राठ क्षेत्र की जिसमे कहा जाता है कि सात भाई राठी जाते है और कोटद्वार में ढाकड़ (पूर्व में की जाने वाली प्रचलन जिसमे कुछ लोग दूसरे नगर से समस्त ग्राम के लिए इकट्ठा राशन लाते थे दुकानों के अभाव के कारण)लेने जाते हैं। उस जागर में आप सुने तो देखेंगे कि साथ भाई राठी जेकब जा रहे होते हैं तो नमक का थैला एक जगह पर रखते हैं और अकस्मात वह भारी होजाता है और कोई उसे उठा ही नही पाता। वह उस थैले को खोलते हैं तो पाते हैं कि उसमें शिवलिंग था और लेजाते लेजाते उस लिंग के चार फाड़े होगये। एक मत यह कहता है कि वह चार फाड़े अलग स्थानों में बंटे हैं- कुछ डोबरियाल जाती के स्थान में तो कुछ ममगाईं जाती व अन्य दो जाती के स्थानों में। इस प्रकार राठी समाज मे भैरव उत्पन्न हुए।

ठीक उसी प्रकार राठ की एक देवी है दिवा। दीवा डाडो की कथा भी अत्यंत प्रचलित है।”मा त्यारो वहालु माता धौण्ड मासु म, अर छै महीना की नौनी मा तेरी खुकली म पकड़ी चाँ”। धौण्ड एक जगह है जहां से ढ़औण्डयाल जाती की उत्पत्ति हुई है। तो कथानुसार एक महिला  छै महीने की अपनी लड़की को लेकर अपने भाइयों की कागली(आग्रह) पर अपने मैथ(मायके) जा रही है तो एक बांझ पेड़ देखती है, तो इतने में बर्फबारी शुरू होजाती है जिस कारण उसकी छह मासी लड़की की मृत्यु होजाती है। यह देखते हुए वह रट बिलखते अपने मायके जाती है तो सात भाई राठी उसे निहारते हैं, उसके अश्रु पोंछते हुए उसे धीरज देते है व दान दक्षिणा देकर उसे पुनः ससुराल भेजते है।और यही परंपरा आज भी राठ के अंदर है। ग्वारी गांव(राठ क्षेत्र) में आज भी 7 राठियों(ग्रामनिवासियों) पर यह होता है व देवी (ग्रामनिवासी महिला जिस पर देवी अवतरित होती है)पर सात दूण, साथ कण्डे बनाकर उसे पुनः अपने ससुराल विदा किया जाता है। यह परंपराए अभी भी है किंतु कथाएं हर स्थान पर बदली हुई हैं। क्योंकि इनको लिखित रूप में कोई वर्णन नही दिया गया है जो कि एक वेदना है। इस कारण यह सत्यापित करना अत्यंत कठिन होजाता है कि यह वास्तव में सत्य है या मात्र एक किवदंती। हमने देखा है कि १२ वर्षो5में नंदा देवी राजजात की यात्रा होती है। जिसमे देवी को डोली में लेजाया जाता है व खाटू की पूजा होती है। इस पूजा को पूर्ण करने के लिए भी सिद्ध जागरी को बुलाया जाता है।

चूँकि कुमाऊँ में भी अत्यंत मान्यता रही है जागरों की तो वहाँ भी अधिकांश किवदंतिया सुनने को मिलेंगी। झालेराव पुत्र गोल्ज्यू देवता व गोरिल देवता के जन्म व पूजन का विस्तृत वर्णन जागर में सुनने को मिलता है। बागेश्वर का इस पर अत्यंत भीष्म वर्णन है। यहाँ के जागरी चाहे विजयपुर , कौसानी या कांडा के हो , उनके जागरों में शिव के अध्यायों का अत्यंत वर्णन देखने को मिलता है जिसमे प्रमुख है धौलीनग व आठ और नाग के मंदिर। इसे नाग का गढ़ भी कहा जाए तो भी उचित होगा। आज भी कंडारी गांव ने जागरी ठेठ कुमाऊं से आते हैं। यह प्रचलन वर्षों से आज भी चला आरहा है। आज भी यहां उचानु रखा जाता है।एक धबडया देवता है जिनके बारे में कहा जाता है कि यह धै(आवाज़) लगाते हैं और भैरव के ही रूप हैं चूंकि भैरव के पास ये शक्ति थी कि वह५२ मंत्रों से ५२ रूप सकते हैं।

जागर में विविधता हमारी सोचने की क्षमता से भी ऊपर है। उत्तरकाशी में गुरु कैलापीर के जागर का वर्णन है जो कश्मीरी से नाता रखते थे। और कश्मीर में गुरु के होने का उल्लेख गढ़वाल के भी जागरों में मिलता है।इसी प्रकार जागरों में सुमाड़ी(पौड़ी गढ़वाल) के पंखया दादा व मलेथा (टिहरी गढ़वाल)के  माधोसिंह भंडारी का भी वर्णन है जिसमे एक ने पशुबलि व दूसरे ने अपने ग्राम में पानी लाने के लिए देवताओ को स्वयं की बलि अर्पण करदी।

“जेकु नौनु नी हिन्दू वेकु बैकुण्ठ नि होन्दू अर जैकी नौनी नि होंदी वे थे सभा मा छूत मंदन।” अर्थात राजपूतों की सभा मे जिसका बेटा नही होता उसको उद्धारहीन समझा जाता है और जिसकी बेटी नही होती उसे अछूत। तो कहते हैं एक राजा था जिसने 12 वर्ष तपस्या करी और प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे धर्म कन्या दी। उस धर्म कन्या ने पूछा वह जा तो रही है परंतु उसकी सुनेगा कौन और इसी बीच शिव जी के तेज से उत्पत्ति हुई दूधिया नरसिंह की। इसके विपरीत एक कथा यह भी कहती है कि शिवजी ने कलवरी डाली जिसमे से एक गया दूध के कुंड में और दूधिया नरसिंह उत्पन हुए। तो ये कथाएं जो हैं विभिन्न स्थानों में गयी, वहां की भौगौलिक परिस्थितियों के हिसाब से बनगई।

दून के ही एक मानव वैज्ञानिक है लोकेश ओहरी जिन्होंने अपनी पुस्तक “टिल किंगडम कम” में स्वतः लिखा है जिसमे जौनसार के स्थानों का वर्णन है जिसमे महासू देवता, हनोल देवता के जागरों का वर्णन जिसमे यह तक कहा गया है कि जौनसार के जागरों में मुग़लों तक का वर्णन है।

आपको यह जानकर अत्यंत हैरानी होगी कि फ्रांस मूल की एक शोधकर्ता ‘फ्लोहिंस नावा ‘ने पहाड़ी जागरों व लोकगीत पर १०-१२ वर्ष का शोध किया है। जिसपर उन्होंने साफ साफ कहा है कि पहाड़ी लोकगीत, जागरों का जो प्राचीनतम रूप है उसमें दैव्य शक्तियों का होने का आभास है

 तो ये विद्या जो हैं अब विलुप्ति की ओर अग्रसर हो रही है। इसका नुकसान यह है की यह हमारे पहाड़ी संस्कृति का हिस्सा हैं और अगर भूल स्वरूप भी हम अगर इनका सम्मान या इनका अनुसरण नही करेंगे तो हमारे अस्तित्व का वर्चस्व क्या रह जायेगा??यह विडंबना होजाएगी की हमारे रहते हुए भी हमारे इष्ट देवता, ग्राम देवता, हमारे जागर विद्या, हमारे राजाओं की कथाएं सब नष्ट होजाएँगी।

पहाड़ी मान्यताओं में तो यह तक कहा गया है कि जो देवता(अगर हिंसक)है जिसे 6 पीढ़ी तक नही पूजा गया  है वह सातवीं पीढ़ी पर आएगा व नाश का कारण भी बन सकता है। आज विज्ञान और धर्म अलग अलग चलते हैं किंतु विज्ञान भी यही कहता है कि नकारात्मक व सकारात्मक ऊर्जा होती हैं जिसे हम धर्म के नाम पर भूत व भगवान का नाम देदेते हैं। प्रस्तुत बातों का उद्देश्य किसी अंधविश्वास को बढ़ावा देना नही है क्योंकि अंधविश्वास तो स्वत वह चीज़ होती है जिसके होने की कोई पुष्टि नही होती और जिसका अनुसरण बिना किसी मतलब के हो रहा है।

अंत में यह हम सभी के लिए अत्यंत गौरान्वित होने की भी बात है  कि प्रीतम भरतवाण, चंद्र सिंह राही, दिलबर सिंह राही(सबसे बड़े जागरी)नरेंद्र सिंह नेगी, पप्पू कार्की  इत्यादि ऐसे जागरी सम्राट है जिन्होंने जागरों को पुरे विश्व भर में ख्याति दिलाई है। एवं कई गांव में एक विशेष मुहिम शुरु हुई है जिसके तहत हर वर्ष ग्राम में पितृ देवताओ की पूजा हो रही है व दूर दूर से लोग इसका अनुसरण करने आ रहे है जो कि एक आशा व सकारात्मकता की ओर भी संकेत करता है।

शोभित चंदोला

विशेष आभार-

अशोक खंडूरी- सहपाठी(बी ए- फ्रेंच), स्वरस डोबरियाल- संगीत अध्यापक, अभिषेक थपलियाल , विवेक सिंह- सहपाठी, स्वाति चंदोला


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