कोरोना काल_ परस्थिति का स्थिति पर प्रभाव

जैसा कि विश्व विदित है कि अक्सर बीमारी अकेली नहीं होती बीमारी के साथ मृत्यु और मृत्यु के साथ भय बतौर साथी होते है जबकि भय किसी शरीर को नहीं ले जाता बल्कि शरीर स्वयं भय के साथ चला जाता है।  तो आज भी एक ऐसा माहोल बनता जा रहा है हमारे आस पास भय और डर बहुत ज्यादा हमारे ऊपर हावी हो रहा है ऐसे समय हमें क्या करना चाfहए ये समझ इस  लेखन के माध्यम से साझा करने का प्रयत्न किया गया है।

आज के समय यानि कोविड -19 के काल को बहुत सारे लोग निराशा के रूप में देखते है कुछ करने के लिए है नहीं ऐसा क्यों हो रहा है इसकी समझ नहीं और ऐसा हो हो भी रहा है तो सवाल ये उठता है की क्या करें ? लेकिन आपको पता होना चाहिए की परस्थिति का मन की स्थिति पर प्रभाव पड़ता ही है और अब जो परस्थिति का सामना जो हम कर  रहे है जो हमें पता ही नहीं थी और हमें ये भी नहीं पता था की ये सारे विश्व में फ़ैल सकता है ये शायद पहली अवस्था है जिसने पूरे विश्व को एक साथ एक समय में चोट पहुचाई है।

अगर कोई प्राकृतिक आपदा आती है वह एक जगह आती  है कोई मानवीय आतंक या युद्ध भी एक ही क्षेत्र में होता है शायद ही कभी कोई ऐसी चीज़ हो जो पूरे विश्व में हुई है वो भी इकठ्ठा एक ही समय पर जब हम छोटी से छोटी घटनाओं पर डर और भय क शिकार हो जाते है तो आज हमारे पास एक परस्थिति जो हमने सोचा ही नहीं था उसका मनोस्थिति पर इसका असर पड़ा हुआ है ये हम सोच ही नहीं पा रहे है । तो हमें ये समझने की जरूरत है कि  परस्थिति बाहरी है और मन की स्थिति भीतरी है परस्थिति जितनी कठोर होती मन की स्थिति पर उसका प्रभाव उतना ही गहरा होता है।

भय होना सामान्य व प्राकृत है तो इस कोविड -19 के समय में शांत रहना, निर्भय रहना या निडर रहने के बारे में सोच भी नहीं सकते क्यों की हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते की इस समय में कोई कैसे शांत और निडर रह सकता है और अगर अकस्मात अगर किसी को डर नहीं भी है तो हम उससे जाकर कहते है कैसे आपको डर नही लगता इसका कारण है की बचपन से ही हम देखते आये है की परस्थिति का मन की स्थिति पर असर पड़ता ही है।

तो अब के समय में हमें ये समझना नितांत आवश्यक है परस्थिति बाहर है और मन की स्थिति मेरी अपनी है परस्थिति मन की  स्थिति को नही बनाता है जबकि मन की स्थिति का प्रभाव प्रस्थिति पर १००% पड़ता है जैसे हम इतने दिनों से सीख रहे है कि इस वायरस से अपने परिवार को अपने देश को और विश्व को बचाने के लिए हमें क्या क्या करना है और बार बार सुनकर हमने उन बातों को करना शुरू कर दिया इस तरह हम सब अपनी परवाह कर रहे है लेकिन हमने ये नही सोचा की हमें खुद को बचाने के लिए .

सबको बचने के लिए माँ के विचारो का मनोस्थिति का क्या करना है क्योकि हम सोचते है की वायरस शारीरिक है जो शारीर पर असर करेगा बीमारी होगी म्रत्यु होगी तो हम बीमारी और म्रत्यु के बारे में सोच रहे है और तीसरा है भय जिसे हम नेचुरल या प्राकृत कह रहे है लेकिन ये सोच ही नही रहे की भय का भी कुछ किया जा सकता है या नहीं।

आज के समय में अगर हम किसी से मिलते है तो हम सोचते है की मिलने वाले व्यक्ति को कोरोना है तो मुझे पता होना चाहए की सामने वाले को तो नही है क्यों की अगर उसको है और उसके 1 या 2 फीट की दूरी में  गये तो मुझे भी हो सकता है और हम दूरी की परवाह करने लगते है।

अब हम ये चेक करे की सारा दिन जिनसे हम मिल रहे है उनको डर या भय तो नही है और यदि उनको भय है और हम उनके आस  पास है तो वो डर मेरे अंदर भी आयेगा और उससे भी महत्वपूर्ण ये है की शायद मेरे अंदर पहले से डर है इसका मतलब भय का वायरस पुरे देश के १३० करोड़ लोगो के अन्दर है ।

भय का प्रभाव

हमें अब इस भय के प्रभाव को देखना है डाक्टर हमें ये भी बता रहे है की डर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है और जब कोरोनो वायरस की बात आती है  तो हम सुनते है की इसका प्रभाव बच्चो और बुजुर्गो पर जल्दी पड़ता है लेकिन यदि रोग प्रति रोधक क्षमता की बात करे तो क्या ये एक उम्र के लोगो के लिए ही लागू होता है क्या ? तो इसका जवाब है बील्कुल नहीं ।

रोग प्रति रोधक क्षमता किसी शारीर की उम्र पर निर्भर  नही करता ये मनुष्य की सोच पर भी निर्भर करता है हो सकता है ८०-९० वर्ष के बुजुर्ग व्यक्ति मानसिक स्तर बहुत मजबूत हो सकता है शरीर बूड़ा है लेकिन मन शक्तिशाली उन्होंने कभी नकारात्मक सोचा ही नहीं इसके बिपरीत २०-३० उम्र का व्यक्ति जो लगातार भय या चिंता में है उसका रोग प्रति रोधक क्षमता ब्रद्ध से कमजोर हो सकती है  एक आम दिन में विज्ञानं के अनुसार हम ६०,७०,८० हज़ार विचार मानव मष्तिस्क में आते है लेकिन इस कल में लगातार सूचनाओ के साथ हमारी विचारो की प्रतिशतता निश्चित ही बढ़ गई होगी ।

 विचारो में परिवर्तन कैसे लाये

आज हम एक ऐसे युग में जी रहे है जहा सूचना की कमी नहीं है और लौकडाउन  के समय में जहा सभी अपने घरो में रहते हुए वर्क फ्रॉम होम कर रहे है ऐसे समय में टेलीविजन और सोशल मीडिया के माध्यम से सभी को २४ घंटे इसी से सम्बंधित सूचनाये और समाचार  सुनने को मिलती है अर्थात अपार सूचनाये है अब ये सवाल उठता है  और इतनी जानकारी के साथ इनपुट जो अन्दर जा रहा है  तो कोई कैसे अलग सोच सकता है ? तो यहाँ पर अपार सूचनाओ के बजाय गुन्बत्तापूर्ण सूचनाये भी सवालो के घेरे में आ जाती है अर्थात सकारात्मक सूचनाये हमारी स्वस्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालती है यधपि सूचना देने वाले का इरादा शुध्ह है वो हमें कुछ देना चाहते है सिखाना चाहते है लेकिन हम उतनी सूचनाये सरकार से न्यूज़चैनल से सोशल मीडिया ले रहे है लेकिन सारा दिन हम हर 10 मिनट कोई न कोई शुभचिंतक हर पल का स्टेटस इस महामारी से संभंधित भेज देता हैं क्या इन सबकी आवश्यकता है? हर पल  हम उस बारे में सुनेंगे उसी की तस्वीर देखेंगे और उसी के बारे में सोचेंगे और आने वाले समय में उसी की बात करेंगे हमारी पूरी उर्जा को बीमारी म्रत्यु पेनिक चिंता और इस  तरह से भय हर किसी को अपनी चपेट में लेलेगा ।

इस प्रकार सूचना तो है लेकिन हमें कितना लेना है वो हम पर निर्भर करता है यदि हमें ये पता है की सूचना हमारी सोच बना रही है तो हमारा भय भी बढता जायेगा  ध्यान क्या रखना है ये जानकारी ले सकते है वो हम पहले ही काफी ले चुके है और यदि कोई नई जानकारी  भी आती है तो वह भी हमें मिल जाएगी अतः इस बात पर जोर देना चाहूंगी की क्या ध्यान रखना है उसकी सुचना ली जाये  न की जो नष्ट हो रहा उसकी लगातार जानकारी लेने की जरूरत है और स्थिति की गंभीरता की सुचना भी हमें दिन में एक बार 10 मिनट में मिल जाती है जो काफी है ।

लेकिन इस तरह की सूचनाओ से सारा दिन जूझना आपके डर को बढाएगा वो वायरस इतना डर और अशांति पैदा नहीं करेगा जितना ये सूचनाओ का बिनिमय या सञ्चालन .और लगातार सूचनाये का सञ्चालन हमारे मन को चोट पहुचाता है  और हमारा मन हमरे शारीर को चोट पहुचाता है जब मन और शारीर दोनों कमज़ोर होंगे तो हमारे ऊपर किसी बीमारी का असर ज्यादा जल्दी पड़ता है ।

सावधानियां

तो सबसे पहली साबधानी ये होनी चाहिए की लगातार सूचनाओ से बचा जाये  सरकार  और डाक्टर ने जो हमें बताना है वह हमें एक छोटे से नोट में आ जायेगा उसके लिए इतने सारे आडियो वीडियोज गढ़नाओ की आवश्यकता नही है हर थोड़ी देर बाद।

इस प्रकार हम अपना और पूरे विश्व का बचाओ नहीं बल्कि संकट करक और बढ़ जायेगा क्योकि आज के समय में भय ही महामारी है जो हमारी भावनात्मक स्वस्थ्य पर असर क्र रही है वायरस कुछ समय में खतम हो जायेगा लेकिन भय के कारण बनता डिप्रेसन कब खत्म होगा कुछ पता नहीं।

परवाह करना और भय पैदा करना दोनों अलग अलग चीज़े है तो हमें बचाओ की तरफ ध्यान रखना है . लेकिन उस बीमारी के डर की वजह से जीवन में और सारे संकट नहीं ला सकते इसके लिए हमें ध्यान देना होगा की हमारी भावनात्मक स्वस्थ्य का हमारे मानसिक स्वस्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव है और इनदोनो अर्थात भावनाओ और मानसिक का हमरी शारीरिक स्वस्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव है  कितनी आवादी बिभिन्न तरह की गंभीर बिमारियों से घिरी हुई है क्या हम नहीं सोचना होगा कीं in भावनातमक डिस्ट्रेस का हमारी in साडी बिमारियों पर क्या असर पड़ेगा ? तो जरूरत है हमें अपनी सोच बदलने की उसे सकारात्मक बनाने की क्योंकि हमारी सोच का हमरे जीवन पर बहुत असर पड़ता है

 

डॉ. शगुफ्ता परवीन

विभागाध्यक्ष आर्ट डिपार्टमेंट 

मंगलायतन विश्वविद्यालय 


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