Kedarnath flash flood cag report

कैग रिपोर्ट की खबर से आखें चौंधिया  जाती है, और वो भी अगर २०१३ की केदारनाथ त्रासदी के घोटालों  की हो तो आज का यह कॉलम तो बनता है |आज जब २०१३ में उत्तराखंड सरकार की कैबिनेट में रहे कॉंग्रेस के मंत्रियों की आधी जमात  भाजपा की २०१७ में बनी उत्तराखंड सरकार में हैं | ऐसी स्तिथि में कैबिनेट मंत्रीप्रकाश पंत का यह कहना की कैग  रिपोर्ट में घोटाले के आरोपियों को छोड़ा नहीं जायेगा एक असमंजस की स्तिथि पैदा करता है की क्या यह कार्यवाही उन मंत्रियों पर भी होगी जिनको कैग रिपोर्ट ने  सम्बं धित विभाग और मिनिस्ट्री से जोड़ा है | रिपोर्ट में   UPCL जैसे  विभागों में काफी अनियमिताएं बताई  गई  हैं, जिसमे आपदा प्रभावित क्षेत्रों को बिजली आज तक ना मिल पाने का भी जिक्र किया गया  है | रिपोर्ट  के अनुसार बजट जो की केंद्र द्वारा केदारनाथ आपदा से पुनरुत्थान के लिए दिया  गया था उसका  पूर्ण आवंटन  न कर  पाने क कारण घोटालो का स्वरुप तैय्यार  हुआ है | जिसमे सरकारी एवं प्राइवेट मोड पे काम कर रहे अफसरों को सबसे ज्यादा फायदा हुआ |  इसको  सिद्ध करते हुए कैग की रिपोर्ट बताती है के केंद्र सरकार ने २०१३ – २०१७ के बीच ९२५९ करोड़ रुपये राज्य सरकार को आवंटित किये  , राज्य  सरकार  ने २०१३- २०१४ में  ४६१७ करोड़ रूपए ही विभागों को आवंटित किये, जिसमे साल २०१८ तक सिर्फ ३७०२ करोड़ रुपये का ही खर्च हो पाया। कैग  की रिपोर्ट ने  उत्तराखंड की राज्य सरकार को आईना दिखाया है के शाशन  करने में यहाँ के  नेता अशक्षम हैं | जब यह बजट केंद्र से मिला तब राज्य  सरकार में कांग्रेस  के नेता और मंत्री थे, आज के दिन जो उत्तराखंड  भाजपा में  है, वे  विजय  बहुगुणा उन दिनों उत्तराखंड के मुख्य मंत्री हुआ करते थे |  २०१३ से २०१७  तक राज्य सरकार की  हालत इतनी पस्त  थी की किसी अलग मॉनिटरिंग बॉडी की  केदारनाथ आपदा के पुनर्निर्माण में खर्चा देखने और ऑडिट करने की स्थापना नहीं की गयी | हमारी टीम  ने भी सन २०१७ में दो ITR  फाइल   रुद्रेप्रयाग जिले भेजी थी पर उसका  कोई जवाब  आज तक ना आ पाया |  उत्तराखंड  की स्थापना जब से हुई है तबसे पहाड़ को शोषित करने वाले नेता  अपनी राजनीती से नया रास्ता इजात करते हैं,  पर केदारनाथ आपदा में  राजनितिक फायदा उठाने के लिए अफसरों ने कैसे तंत्र को भ्रष्ट किया इसका साफ़ असर कैग  की रिपोर्ट में दिखता  है, कैग  की रिपोर्ट क अनुसार केदारनाथ के पुरोहितो को आज तक आवास नहीं मुहैया हो पाए  और  कांग्रेस राज्य सरकार  ने अपने मन चेहते ठेकेदारों और कंट्राक्टरो को ठेके दिए | इन हेराफेरी का प्रभाव  भाजपा के शाशन के  समय से भी रहा | चुकी अब समय इतना हो चुका है के केदारनाथ आपदा का वित्तीय खर्चा का  ब्यौरा कैग  के पास भी नहीं  है | आम आदमी और आपदा प्रभावित यह जान गया हैं के उनके साथ राजनीतिज्ञों ने एक भद्दा मज़ाक किया है | जहां  तक आंकलन किया जाये, पूर्व मुख्यमंर्ती हरीश रावत के समय का  हिस्सा इन घोटालो का आता है |  The Doon Mozaic ने पहले भी अपने संस्करणों में इन घोटालों का जिक्र  किया था जो आज सच साबित होते दिख रहा  हैं | आपदा प्रबंधन आज भी ५००० लापता लोगों को मृत नहीं मानता है, वही २०१८ तक भी नरकंकालों का केदारनाथ क आस पास के इलाको से मिलना जारी है |  जिस राज्य  का राजस्व ही पर्यटन से चलता हो उसको ऐसे घोटालो से वित्तीय घटा होना मुमकिन है क्योंकि न तो सिर्फ यह राज्य की साख राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय दर्जे पर गिरता है बल्कि, देवभूमि में  चल रहे  अफसरशाही और vvip  कल्चर का काला चिटठा खोलता है |


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