आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से कश्मीर का हल

मूलतः से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पे काम करने से अक्सर ऐसा लगता है के पीछे दशकों की सारी मुसीबतों का हल डाटा साइंस और मशीन लर्निंग के  सहयोग से ही सोल्व करी  जा सकती हैं | इस बात पे लोग शायद टेक्नोलॉजी पे अतिआशावाद होने का ठप्पा लगा सकते  है, पर जैसे ही हम इक्कीसवी  सदी के  दूसरे दशक में बढ़े तो ब्रेस्ट कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को फर्स्ट स्टेज में पकड़कर आर्टिफिशियल  इंटेलिजेंस  ने सदी के सबसे बड़े हथियार होने का एक पक्ष दिखाया | आज स्मार्टफोन ने हमारी जिंदगी में इतना असर डाला शायद उतना पर्सनल कंप्यूटर ने भी पहले तीन दशकों में नहीं  डाला  था | दुनिया के  हर छोर  पे नए नए स्टार्टअप्स, विश्व को अलग अलग तकनीक दे रहे  है , कोई चाय बना रहा है, कोई खाना पंहुचा रहा है,  यही नहीं, बीते दिनों पोलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट, प्रशांत किशोर ने भी एडमिट किया  के  वो किसी भी पार्टी की जीतने  की भविष्यवाणी भी अपने आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के  मॉडल से करते हैं | यही सब बातें और शाक्ष्य, इस बात को सोचने पे मजबूर कर रहे हैं के,कश्मीर जैसा नाज़ुक मुद्दा सुलझाने का कही मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक शशक्त हथियार तो नहीं है  |  यूरोप में आजकल ऐसा सरकारी प्रोजेक्ट उपयोग में लाया जा रहा है ताकि, क्रॉस बॉर्डर ट्रैफिक की गति बढ़ाई  जा सके |

एनालॉग क ज़माने में शुरू हुआ कश्मीर मुद्दा आज डिजिटल इंडिया तक आ पंहुचा है | डाटा एक्सेस करना और लाइव ऐट्रिब्यूट्स का संचय करना आज के समय में मात्र एक खेल है | इजराइल ने अपने क्रॉस बॉर्डर प्रोटेक्शन क लिए ऑटोमेटेड युद्धयान्त्रिकी से लैस  करी है | वही आज भी पाकिस्तान की बात आकर loc में ied लगाकर सेना क जवानो को चकमा देती है |

जब भारतवर्ष ने अपने मेहनतकश सॉफ्टवेयर ओउटसोर्सिंग पावर से अमेरिका और यूरोप जैसे प्रांतो को सक्षम बनाया है तो देश की सेना इससे खुद वंचित क्यों हैं ?

कुछ एक जवाब तो मेरे पास भी हैं, देश के महानुभाव ही स्वदेशी चीज़ो को ठेंगा दिखाते हैं, उनका यह भाव विदेश से इम्पोर्टेड चीज़ो के लिए नहीं होता. भले ही अब भारत का आदमी बाहर से वही स्वदेशी कमोडिटी देश में कर दे पर जब तक् make इन फलाना का तैग न लगे, तब तक यहाँ कोई भाव नहीं देता| इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जब पी एम मोदी को जब खरे पानी से प्याऊ जल की गाड़ी में बैठाया था तो कई लोगो ने इजराइल की प्रौद्योगिकी को खूब सराहा था पर वह काम भारत में भी काफी कॉलेज और यूनिवर्सिटी में बच्चो के शोधपत्रों के में मिल जायेगा और कारण सिर्फ एक ही है, स्वदेशी प्रौद्योगिकी में विश्वास न कर्ने केए | कश्मीर का हल भी ऐसे ही किसी आदमी के पास छुपा है जो घाटी में एडमिनिस्ट्रेशन की नयी इबारत लिखने में भारत की मदद कर सकता है |  बात यह भी नहीं है के अभी सेना आर्टिफिशियल  इंटेलिजेंस सिस्टम्स का उपयोग नहीं करती है, bsf के जवानो और CRPF को क्रोने सिस्टम्स नामक एक कंपनी आज भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से डाटा देतीं है जिससे वह घुसपैठियों को पकड़ सकते हैं | इन दिनों भी सेना अपने इंटेलिजेंस  और मशीन लर्निंग अल्गोरिथ्म्स की वजह से अलगावादियों और पत्थरबाजों के होने के ट्रेंड्स से आतंकवादियों के ठिकाने पता लगाती है पर वक़्त आ गया है के इस टेक्नोलॉजी से कश्मीर  सदियों पुरानी  गले के फ़ांस को भी सुलझाया जा सके |  


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *